DEEPAK

बात सन 1979 जनवरी की है ,रात का सन्नाटा था ,चारो तरफ से हवा की सांय -सांय की आवाज आ रही थी|ऐसे में दीपक ऋषिकेश से देहली जा रहे थे,बड़ी ही सर्द रात थी |चारो तरफ कोहरा ही कोहरा था ,कोहरा भी ऐसा की सोफ्टी कोन में भर लो बस में सिर्फ चंद ही लोग थे | बस तेजी से भागी जा रही थी ,दीपक ने गर्म कपड़ो से अपने आपको लपेट रखा था |

बात सन 1979 जनवरी की है ,रात का सन्नाटा था ,चारो तरफ से हवा की सांय -सांय की आवाज आ रही थी|ऐसे में दीपक ऋषिकेश से देहली जा रहे थे,बड़ी ही सर्द रात थी |चारो तरफ कोहरा ही कोहरा था ,कोहरा भी ऐसा की सोफ्टी कोन में भर लो बस में सिर्फ चंद ही लोग थे | बस तेजी से भागी जा रही थी ,दीपक ने गर्म कपड़ो से अपने आपको लपेट रखा था |
बस में बिलकुल ख़ामोशी छायी थी ,और बस की ख़ामोशी थी ,की टूटने का नाम ही नहीं ले रही थी| |दीपक का दिल, ऐसे सफ़र में कभी -कभी गुनगुनाने का करने लगता था |पर रात हो रही थी ,और बस में जितनी मुसाफिर थे सब सो रहे थे |दीपक ने अपने मन की बात मन में ही दबा ली ,और सोचने लगे की घर पहुचते ही सबसे पहले अपना पसंदीदा गाना गुनगुनायेंगे ,तब जाकर उन्हे चैन मिलेगा |

अभी वो ये सोच ही रहे थे ,की बस चिहुक कर रुक गयी |ड्राईवर ने नीचे उतर कर देखा तो सब ठीक था ,पर बस नहीं चल रही थी |मध्य रात्री और वो भी सर्दियों की करे तो क्या करे ,ड्राईवर ने कह दिया की बिलकुल बस स्टैंड के पास ही आकर ख़राब हुई है |एक छोटे से कस्बे का बस स्टैंड ,जहा जरुरी नहीं की कोई बस स्टैंड में अंदर आये भी |ड्राईवर ने कहा की आप सब को यही उतरना पड़ेगा ,तो बस में बैठे पसेंजेर बोले की हम तो बस में ही रुक जायेंगे |जब कोई और बस आएगी तब चले जायेंगे ,तो ड्राईवर कहने लगा की हम तो बस स्टैंड पर जा रहे है |अपनी जिम्मेदारी पर रुकना हो तो रुको |सब यात्री नीचे उतर गए ,दीपक भी मायूस हो कर स्टैंड की तरफ जाने लगे |
अभी वो चंद कदम ही चले थे ,की उन्हे एक आवाज़ सुनाई दी दीपक तुम यहाँ ?? दीपक ने देखा अरे ये तो नरेन्द्र चाचाजी की आवाज़ है ,इतनी ठण्ड में यहाँ ?? चाचाजी ने बताया की आज वो बहुत दिनों के बाद, अपने एक फ्रेंड से मिलने आये थे और ताश खेलने बैठ गए, और टाइम का पता ही नहीं चला |और फिर वो दीपक को अपने साथ अपने घर ले गए |दीपक ने एक बार कोहरे भरे आसमान को देखा मानो कह रहे हो की ''प्रभु तेरी लीला अपरम्पार है '' (@तो ऐसे ही अपने कोई अनमोल पल मुझे भी लिख भेजिए )
अभी वो चंद कदम ही चले थे ,की उन्हे एक आवाज़ सुनाई दी दीपक तुम यहाँ ?? दीपक ने देखा अरे ये तो नरेन्द्र चाचाजी की आवाज़ है ,इतनी ठण्ड में यहाँ ?? चाचाजी ने बताया की आज वो बहुत दिनों के बाद, अपने एक फ्रेंड से मिलने आये थे और ताश खेलने बैठ गए, और टाइम का पता ही नहीं चला |और फिर वो दीपक को अपने साथ अपने घर ले गए |दीपक ने एक बार कोहरे भरे आसमान को देखा मानो कह रहे हो की ''प्रभु तेरी लीला अपरम्पार है '' (@तो ऐसे ही अपने कोई अनमोल पल मुझे भी लिख भेजिए )
चलते -चलते =जीना उसके लिए ,जो जीने का सहारा हो
चाहना उसको ,जो जान से भी प्यारा हो
राह में तो लाखो मिलेंगे ,लेकिन साथ उसका दो
जिसने भीड़ में भी ,आपको पुकारा हो ||
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