
मुकेश अपने हाथ में लालटेन लिए हुए उस अँधेरी गहरी सुरंग में आगे बढता चला गया | आज वह अपना अधुरा काम पूरा करना चाहता था, यह सुरंग उसके सात पीढ़ी में कोई भी पार नही कर पाया था !! कोई भी नही जनता था की ये सुरंग आखिर जाती कहाँ पर है? मुकेश ने एक गहरी लम्बी सांस ली और मज़बूत इरादे के साथ उस गहरी लम्बी सुरंग में बढ़ता चला गया ।मुकेश को ऐसा लग रहा था, जैसे उसके पैरों के नीचे किसी ने मखमली कालीन बिछा दिया हो । लालटेन को तनिक नीचे झुकाकर ज्यू ही मुकेश ने देखा तो वो देखता ही रह गया ! रेड कलर का कारपेट बिछा हुआ था !मुकेश संभल-संभल कर आगे बढ़ता जा रहा था । कुछ आगे जाने पर उसे किसी झरने के गिरने की आवाज़ सुने दी, सुरंग की एक साइड में 'सुनहरे पानी का एक वाटर फाल ' था ऐसा लग रहा था की मानो पिघला हुआ 'सोना' बह रहा हो । पर मुकेश ने उस झरने पर एक सरसरी नज़र डाली और आगे बढ़ गया ।
इस समय मुकेश एक हरे -भरे गार्डेन में था , हजारों की संख्या में मोर अपना पंख फ़ैलाये नृत्य कर रहे थे , चिड़ियाँ उड़ रही थी । मन को लुभाने वाला द्रश्य था परन्तु, मुकेश आगे बढ़ता ही जा रहा था । अब तक मुकेश न जाने कितने किलोमीटर उस गुफा को पार कर चूका था उसको नही पता था ।लालटेन की बेटरी भी ख़तम हो चुकी थी । मुकेश अपने साथ एक बैग लाया था , जिसे उसने अपनी कमर पर लगा रखा था उसमे वह छह महीने तक का इस्तेमाल का भरपूर जरुरी सामान लाया था । उसने लालटेन में बेटरी डाली, अपने साथ लाया खाने का पकेट खोला आलू की सब्जी के साथ दो निवाले बड़ी मुश्किल से उसने खाए ,पानी पिया और और आगे बढ़ गया । क्रमश:

चलते -चलते = Kah Do To Ek Kahani Hu,
Rakho To Ek Nishani Hu,
Jise Rok Na Payi Sari Duniya,
Bas Wohi Ek Bund Ankho Ka Pani Hu...













