COPY CODE SNIPPET its tym to lyf moments (IMAGINARY STORY ): December 2016

Thursday, December 8, 2016


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                                                              katyayani


कात्यायनी ने जल्दी से राहुल का टिफिन पैक किया और उसको बैग में डाल दिया। राहुल अभी नहाने में था तभी उसकी आवाज़ आयी ''मम्मी पानी बहुत ठंडा है कैसे नहाऊँ ?'' कात्यायनी को पता था कि ये ऐसे ही स्कूल के लिए लेट कर देगा और फिर जब स्कूल बस निकल जाएगी तो फिर उसको ही छोड़ कर आना पड़ेगा। वो बाथरूम में गयी, जल्दी से गीज़र में से गर्म पानी निकाला और फिर राहुल को खुद ही नहला दिया। उसने सोचा 'ये लड़का भी न दस के बराबर है!' राहुल को टॉवल से पौछते- पौछते उसे शैलेश की याद आ गयी। बिज़नेस के काम से लंदन गए हैं, पता नहीं कितना टाइम लग जायेगा। 

इतने में घर के बाहर उसको बस का हॉर्न सुनाई दिया। लटपट वो राहुल को लेकर बाहर भागी, साथ ही स्कूल बैग व राहुल के हाथ में सैंडविच देना नहीं भूली। राहुल को स्कूल बस में बैठा कर वो अब काफी फ्री महसूस कर रही थी। वो अपने रूम में गयी और अपना एंगेजमेंट वाला एल्बम निकल कर अपनी पुरानी यादों के पन्ने उलटने लगी। शैलेश ने जब  उसको अंगूठी पहनाने  के लिए स्पर्श किया था तो उसका प्रथम स्पर्श वो आज तक नहीं भूल पायी।

और वो दिन जब वो जयमाला डालने के लिए स्टेज पर आयी और लड़खड़ा गयी थी। वो गिरने ही वाली थी कि मज़बूत इरादे और मज़बूत बाहों वाले 'शैल' ने उसको गिरने नहीं दिया और हाथ बढ़ा कर उसको थाम  लिया था। उसकी सेहली सुचेता तो शैल की कितनी बड़ी फैन है। तभी उसकी मोबाइल की घंटी बजी। शैल का फोन था। वो एक घंटे के बाद उसके पास होंगे, ये सुनकर उसके गुलाबी होठों पर हँसी और आँखों में नमी आ गयी.... अरे ! ख़ुशी की ....... । 

चलते -चलते =  Itni aasani se kaise bhul jata hai koi,
                        Dur rehkar bhi yaad ata hai koi,
                        Umar bhar yaad karte rahenge hum,
                        Dekhte hain kab tak hame bhulta hai koi…

Friday, December 2, 2016



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                                                  '' मृगनयनी '' (सिक्स्थ एपिसोड )
अभी तक आपने पढ़ा की मृगनयनी थकी होने के कारण सो जाती है।  अब इससे आगे ...... बालक के रोने से मृगनयनी की नींद खुल गयी। उसने बालक को गोद में उठाया और उसको चुप करने लगी । इतनी में वहां एक स्त्री आयी और कहने लगी मृगनयनी से, ''लाओ इसे मुझे दे दो। मेरे कोई औलाद नहीं है, में इसे पाल लूंगी।'' मृगनयनी ने उसको सवालिया दृष्टि से देखा मानो पूछ रही हो की क्यों दे दू। वह स्त्री उसकी सवालिया दृष्टि को समझ गयी और एक मीठी हंसी के साथ बोली ''मेरा नाम सुकन्या है, में आदि काल से यही रहती हूँ और सब बरसो से तुम्हारे यहाँ आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं'', और बोली कि, ''तुम जो यह बालक देख रही हो न,'' फिर क्षणिक रुक कर बोली, ''ये मायावी है''। ''मायावी?'' मृगनयनी अपनी आश्चर्यजनक आवाज़ में आँखों को चौड़ी करके बोली ! 'हाँ', वह स्त्री बोली। ''ये वही बाघ है जिसको तुम पाल रही थी, जब तुम अपने काबिले से यहाँ आ गयी तो वह बाघ तुमको बालक के रूप में मिल गया'', फिर थोड़ा रुक कर बोली कि ''तुम जब - जब मुसीबत में पड़ोगी यह बालक तुम्हारे पास किसी न किसी रूप में बचाने के लिए चला आएगा। बालक को उस स्त्री को देकर मृगनयनी ने उसको प्रणाम किया और आगे का रास्ता तय करने के लिए उससे इज़ाज़त मांगी। उस स्त्री ने मृगनयनी के सर पर आशीर्वाद भरा हाथ रखा और सजल नेत्रों से उसको विदाई दी । 
करीब तीन - चार घंटे की यात्रा करने के बाद उसको हम उम्र साथी खेलते हुए दिखाई दिए, हालाँकि वो उनको जानती नहीं थी तथापि वो उसको बहुत अपने लगे। बहुत दिनों के बाद उसको हमउम्र दिखाई दिए थे। वह भी उनके साथ पकड़म - पकड़ाई खलने लगी तभी उनमे से एक लड़का बोला ''आओ मृगनयनी मुझे पकड़ो'', मृगनयनी अब तक समझ चुकी थी की वह एक '' दिव्य काल '' में प्रवेश कर चुकी है, और जहां वह किसी बहुत बड़े उदेश्श्य को पूरा करने के लिए आयी है। मगर अब तक उसको अपना ही उद्देश्य पता नही चला है, न जाने उसको अभी और कितना चलना है और कहाँ और किसके पास जाना है?  । क्रमश: 

चलते - चलते = हाथ ऊपर वाले ने दिए हैं 
                        मगर लकीरें अपनी मेह्नत से खुद बनायीं हैं। ...... 

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