COPY CODE SNIPPET its tym to lyf moments (IMAGINARY STORY ): '' शैल चन्द्र ''
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Wednesday, January 1, 2014



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                                       '' शैल चन्द्र ''

शैल    ने    अपनी   अलमारी    खोली   सारी   साड़ियों  के  बीच   में   से   उसने  अपनी   शादी   कि   साडी   पर  प्यार   से  हाथ  फेरा  आज   उसकी   विवाह   कि   वर्षगाठ   है, चन्द्र शेखर उसे   आज   भी  उसे   बिलकुल   नवविवाहिता    कि  तरह  रखते  हैं ।उसने   बेड   के  पास  रखी,  'शेखर'  कि  फ़ोटो    पर   कुर्बान   हो   जाने  वाली  दृष्टि    डाली,  और   उसके  होंठो  पर  एक   तृप्ति   भरी  मुस्कान  खिल  उठी , मगर   नेत्र   सजल  हो  गये  ।

वो    दादी  कि  कितनी  दुलारी  थी , दादी  शैल  -शैल   कहते  थकती  नहीं  थी , और  वो   भी  तो  दादी  का  कितना  ख्याल  रखती  थी  । दादी  कि  एक  आवाज़  पर  ही, रात  को   चाहे   वो  कितनी  भी  गहरी  नींद  में  हो  उठ  कर  खड़ी   हो   जाती  थी  । और  फिर  दादी  के  जाने   के  बाद   'माँ  -पापा'  कि  दुलारी  हो  गयी ,  और  आज  भी  है । 

अभी   वो  ये  सब  सोच  ही  रही  थी  कि, उसका  मोबाइल  फोन  घनघना  उठा । उसने   देखा  'पापा  का फोन  है' ,पापा  ने  शैल  को   बधाई   दी ,पापा  से  बात  करते  -करते  शैल  कि  आवाज़  भरभरा  गयी , पापा  बोले  शैलू   क्या  हुआ  बेटा? शैल   ने  उत्तर  दिया  कुछ  नहीं  पापा  आप दोनों  को  बहुत  मिस   कर  रही  हु  । तभी  'माँ  कि  आवाज़'  आयी ''बधाई  हो  बेटा  तुम्हे  और  दामाद जी  दोनों   को'' माँ  आप   कैसी  हो ? मै   और  तेरे  पापा  बिलकुल  ठीक  हैं , और  तुम  लोग  कब  आ  रहे  हो  यहाँ  इंडिया  में ? पता  है  पुरे  नौ  साल  हो  गए  हैं  हमें  तुझे  देखे  हुए,और  ये  कहते  -कहते  माँ  कि रोते -रोते   हिचकियाँ  बंध  गयी, पापा  ने  माँ  के  हाथों  से  फोन  ले  लिया, ये  कहते  -कहते  कि  आज  के  दिन  भी  बच्ची  को  रुलाओगी   क्या । फिर  भरे  कंठ  से  पापा  बोले  शैल  बेटा   रखता  हूँ ,अपना  ख्याल  रखना  और  हो  सके  तो  आने  कि  कोशिश  करना  बेटा ।हाँ  पापा  मै  आउंगी  बहुत  जल्दी  ये  कहते  हुए  शैल  ने  फोन  रख  दिया । 

तभी  पोर्च  में  चन्द्र शेखर  कि   कार  कि  आवाज़  आयी ,शैल  ने  अपने  चेहरे  पर  जल्दी  से  पानी  कि  छीटे   मारी ,  तब  तक ' चन्द्र '  अंदर आ  चुके  थे । चन्द्र  ने  आते  ही  शैल  कि  भीगी  आँखों   को  भांप  लिया  और  बोले ''माँ -पापा ''  से बात  हुई  थी  ? हम्म , शैल  बोली  वो  बधाई  दे  रहे  थे , चन्द्र  ने  अपने  दोनों  हाथो  में  शैल  का  हाथ  लेते  हुए  कहा  कि  चलोगी  माँ  पापा  से  मिलने ! ''ओ   शेखर''  और  वो चन्द्र  से  लिपट  गयी ,चन्द्र  बोले  चलो   बैग  पैक  कर  लो  पांच  घंटे  बाद  हमारी  फलाईट  है!

शैल  ने  जल्दी-जल्दी  हाउस मिस्ट्रेस  को  जरुरी  निर्देश  दिए , और  एक घंटे  के  अंदर -अंदर  वो  तैयार  थे । शैल  ने  इसी  बीच  ये  सब  सोच  लिया  था , कि किस  को  क्या  गिफ्ट  देना  है  । आज  तो  पुरे  विश्व  में   एक  ही  देश  का  सामान  मिलता  है , सो  राजधानी  से  ही  सबके  लिए कुछ    न  कुछ  ले  लेंगे । चलो  भई,  चन्द्र  बहार  से  कहते  हुए  आये, काफी  लम्बा  रन  है ,और  फिर  एअरपोर्ट  कि  फॉर्मेलिटी  भी  तो  पूरी  करनी  पड़ती  है । फिर  एक दम  चौँक  कर  बोले , बस  यही  एक छोटा  सा  बैग ! हाँ  शैल  ने  अपनी  साडी  का  पल्लू सम्भालते  हुए  कहा । फिर  चन्द्र  स्वयं  ही  ज़ोर से   हंस   पड़े  ओह , इस  बार  पूरी  शौपिंग  अपने  ही  देश  में  होगी, और  फिर  मुस्कराते  हुए  उन्होंने एक  हाथ  में  अपना  बैग  उठा  लिया , और  दूसरे  हाथ  से  शैल  कि  पतली  कमर  को  थाम  कर बहार  कि  तरफ  बढ़  चले  । 

इस वक़्त  वो  दोनों  प्लेन  में  हैं , एक  साथ , शैल  बहुत  रोमांचित  हो  रही  थी ।  उसने चन्द्र शेखर  कि  तरफ  देखा , वो  सीट  में  लगे  कंप्यूटर  पर  गेम  खेलने  में  बिजी  थे । शैल  ने  खिड़की  से  बहार  बादलों  को  देखा ,और  प्लेन  जब  राजधानी  पहुचेगा  तब  पहुचेगा  मगर  शैल  तो  अभी  अपनी  आत्मा  से  अपनी  यादों  से  वहाँ  पहुच  चुकी  थी । 

 सवेरे  वो  लोग  अपने  देश  कि  मिटटी   पर  थे , अपना  वतन  शैल  अपने  देश  कि  हवाओ  को  अपनी  साँसों  में  अंदर  तक  भर  लेना  चाहती  थी । शैल  ने  चन्द्र  कि  तरफ  देखा,  उनकी आँखों  से अश्रु  बह  रहे  थे । शैल  को  अपनी  और  देखता  पा   चन्द्र शेखर  बोले कुछ  नहीं बस ये तो ख़ुशी के  आंसू हैं । शैल बोली  'थैंक यू ' चन्द्र  इतना कीमती  तोहफा देने के लिए इससे  कीमती  गिफ्ट मेरे लिए कुछ नहीं हो  सकता । एयर पोर्ट से बहार  आये  तो  देखा  माँ -पापा खड़े हैं , शैल ने चन्द्र शेखर कि तरफ देखा तो वो बोले कि मैंने फोन कर दिया था !और माँ ने  शैल  को  देखते  ही अपनी  दोनों  बाहें  फैला  दी , और  शैल किसी  शिशु  कि  भांति  माँ  कि ममतामयी  स्नेहिल  अंक में समां  गयी , उसने धीरे  से  पापा कि तरफ  देखा  वो  अपने  चश्में  का  शीशा  साफ़  कर  रहे  थे  अपनी  भीगी पलकें  लिए  चन्द्र ने धीरे से  अपने  रुमाल  से  पापा  के  आंसू  साफ़  किये  और  फिर  पापा  के  पैरों  में  झुक  गए  उनका  आशीर्वाद लेने  के  लिए । …।     

 

चलते- चलते =दुआओँ कि  भीड़  में एक  दुआ  हमारी ,
                       जिस  में  मांगी हमने हर  ख़ुशी  तुम,

                      जब भी मुस्कराये आप  दिल  से,

                      समझो दुआ  कबूल  हुई  हमारी  … ....    

                           

            
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