COPY CODE SNIPPET its tym to lyf moments (IMAGINARY STORY ): 2016

Thursday, December 8, 2016


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                                                              katyayani


कात्यायनी ने जल्दी से राहुल का टिफिन पैक किया और उसको बैग में डाल दिया। राहुल अभी नहाने में था तभी उसकी आवाज़ आयी ''मम्मी पानी बहुत ठंडा है कैसे नहाऊँ ?'' कात्यायनी को पता था कि ये ऐसे ही स्कूल के लिए लेट कर देगा और फिर जब स्कूल बस निकल जाएगी तो फिर उसको ही छोड़ कर आना पड़ेगा। वो बाथरूम में गयी, जल्दी से गीज़र में से गर्म पानी निकाला और फिर राहुल को खुद ही नहला दिया। उसने सोचा 'ये लड़का भी न दस के बराबर है!' राहुल को टॉवल से पौछते- पौछते उसे शैलेश की याद आ गयी। बिज़नेस के काम से लंदन गए हैं, पता नहीं कितना टाइम लग जायेगा। 

इतने में घर के बाहर उसको बस का हॉर्न सुनाई दिया। लटपट वो राहुल को लेकर बाहर भागी, साथ ही स्कूल बैग व राहुल के हाथ में सैंडविच देना नहीं भूली। राहुल को स्कूल बस में बैठा कर वो अब काफी फ्री महसूस कर रही थी। वो अपने रूम में गयी और अपना एंगेजमेंट वाला एल्बम निकल कर अपनी पुरानी यादों के पन्ने उलटने लगी। शैलेश ने जब  उसको अंगूठी पहनाने  के लिए स्पर्श किया था तो उसका प्रथम स्पर्श वो आज तक नहीं भूल पायी।

और वो दिन जब वो जयमाला डालने के लिए स्टेज पर आयी और लड़खड़ा गयी थी। वो गिरने ही वाली थी कि मज़बूत इरादे और मज़बूत बाहों वाले 'शैल' ने उसको गिरने नहीं दिया और हाथ बढ़ा कर उसको थाम  लिया था। उसकी सेहली सुचेता तो शैल की कितनी बड़ी फैन है। तभी उसकी मोबाइल की घंटी बजी। शैल का फोन था। वो एक घंटे के बाद उसके पास होंगे, ये सुनकर उसके गुलाबी होठों पर हँसी और आँखों में नमी आ गयी.... अरे ! ख़ुशी की ....... । 

चलते -चलते =  Itni aasani se kaise bhul jata hai koi,
                        Dur rehkar bhi yaad ata hai koi,
                        Umar bhar yaad karte rahenge hum,
                        Dekhte hain kab tak hame bhulta hai koi…

Friday, December 2, 2016



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                                                  '' मृगनयनी '' (सिक्स्थ एपिसोड )
अभी तक आपने पढ़ा की मृगनयनी थकी होने के कारण सो जाती है।  अब इससे आगे ...... बालक के रोने से मृगनयनी की नींद खुल गयी। उसने बालक को गोद में उठाया और उसको चुप करने लगी । इतनी में वहां एक स्त्री आयी और कहने लगी मृगनयनी से, ''लाओ इसे मुझे दे दो। मेरे कोई औलाद नहीं है, में इसे पाल लूंगी।'' मृगनयनी ने उसको सवालिया दृष्टि से देखा मानो पूछ रही हो की क्यों दे दू। वह स्त्री उसकी सवालिया दृष्टि को समझ गयी और एक मीठी हंसी के साथ बोली ''मेरा नाम सुकन्या है, में आदि काल से यही रहती हूँ और सब बरसो से तुम्हारे यहाँ आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं'', और बोली कि, ''तुम जो यह बालक देख रही हो न,'' फिर क्षणिक रुक कर बोली, ''ये मायावी है''। ''मायावी?'' मृगनयनी अपनी आश्चर्यजनक आवाज़ में आँखों को चौड़ी करके बोली ! 'हाँ', वह स्त्री बोली। ''ये वही बाघ है जिसको तुम पाल रही थी, जब तुम अपने काबिले से यहाँ आ गयी तो वह बाघ तुमको बालक के रूप में मिल गया'', फिर थोड़ा रुक कर बोली कि ''तुम जब - जब मुसीबत में पड़ोगी यह बालक तुम्हारे पास किसी न किसी रूप में बचाने के लिए चला आएगा। बालक को उस स्त्री को देकर मृगनयनी ने उसको प्रणाम किया और आगे का रास्ता तय करने के लिए उससे इज़ाज़त मांगी। उस स्त्री ने मृगनयनी के सर पर आशीर्वाद भरा हाथ रखा और सजल नेत्रों से उसको विदाई दी । 
करीब तीन - चार घंटे की यात्रा करने के बाद उसको हम उम्र साथी खेलते हुए दिखाई दिए, हालाँकि वो उनको जानती नहीं थी तथापि वो उसको बहुत अपने लगे। बहुत दिनों के बाद उसको हमउम्र दिखाई दिए थे। वह भी उनके साथ पकड़म - पकड़ाई खलने लगी तभी उनमे से एक लड़का बोला ''आओ मृगनयनी मुझे पकड़ो'', मृगनयनी अब तक समझ चुकी थी की वह एक '' दिव्य काल '' में प्रवेश कर चुकी है, और जहां वह किसी बहुत बड़े उदेश्श्य को पूरा करने के लिए आयी है। मगर अब तक उसको अपना ही उद्देश्य पता नही चला है, न जाने उसको अभी और कितना चलना है और कहाँ और किसके पास जाना है?  । क्रमश: 

चलते - चलते = हाथ ऊपर वाले ने दिए हैं 
                        मगर लकीरें अपनी मेह्नत से खुद बनायीं हैं। ...... 

Wednesday, November 30, 2016

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                                 '' मृगनयनी ''   (फिफ्थ एपिसोड )
अभी तक आपने पढ़ा मृगनयनी जूते पहन कर आकाश में उड़ जाती है। अब इससे आगे ..... वो बहुत ऊँची  उड़ान उडना  चाहती है , पर वो अपना मन एकाग्र नहीं कर पाती सो वह डगमगाने लगती है और नीचे आ जाती है । वह अपने जूतों को अपनी पोटली में बांध लेती है और अपने नन्हे से मन में ये सोच लेती है की शायद ये भी किसी उचित समय  काम आएंगे । 
मृगनयनी दृढ़ कदमो के साथ आगे बढ़ने लगी। सुरम्य वातावरण था, मंद -मंद बयार चल रही थी, प्रकृति ने रात का आँचल ओढ़ लिया था, रजनीगंधा के पुष्पो की महक बड़ी अच्छी लग रही थी । तभी अपनी मस्ती में चलती मृगनयनी को  बालक के रोने की आवाज़ सुनाई दी। वो ठिठकी और चारो ओर देखने लगी कि कहाँ से आवाज़ आ रही है। फिर जिस तरफ से आवाज़ आ रही थी, वो उसी दिशा में आगे बढ़ चली । नदी किनारे कमल के पत्ते पे एक नवजात शिशु लेटा था। उसने उसको अपने छोटे- छोटे हाथों में  उठा लिया और आस -पास देखा मगर दूर - दूर तक भी कोई दिखाई नहीं दिया ।  

उसने बालक को उठा लिया और आगे की ओर बढ़नेलगी। एक जगह रात का अलाव जल रहा था, उसने रात को वही रुकने का निशचय कर लिया । बालक भूखा था, उसने अपनी पोटली में देखा तो उसमे दूध की बोतल थी।  अब उसकी समझ में आ गया कि उसकी छोटी- मोटी जरूरतों को तो ये पोटली ही पूरा कर देगी । बालक को दूध पीला कर उसने जमीन पर एक कपडा बिछा कर उसे सुला दिया। थकी  होने के कारण उसे भी नींद आ गयी क्रमश: 

चलते - चलते  = उड़ान मेरी कोई मत रोको आज
                        उड़ने दो उड़ने दो आज मुझे गगन विशाल ।  ....... 

Monday, November 28, 2016

       
                               If friends were flowers, I would pick You Images                                             '' मृगनयनी '' (फोर्थ एपिसोड )
अभी तक अपने पढ़ा की मृगनयनी बेड पे लेट कर सो गयी थी, उसको बहार से पदचाप सुनाई दिए वह कुनमुनाई अब इससे आगे। ....... पास आते पदचाप को सुनकर वह उठी और बेड के नीचे छुप गयी वह पदचाप झोपडी में एंटर हो गए , मृगनैनी ने नीचे से लेटे - लेटे ही देखा की की अंदर आने वाले शख्स के पैर बहुत मोटे -मोटे हैं, उसे आने वाले शख्स की लंबाई का अंदाज़ा नहीं हुआ फिर उसने सोचा झोपडी ज्यादा बड़ी नहीं है 
सो जो आया है या आयी है ज्यादा ऊँची नहीं होगी अपने इस कैलकुलेशन पे उसे बड़ी हंसी आयी । 

उसने सोचा की वो चुपके से निकल कर यहाँ से भाग जाएगी, तभी उसे एक भारी सी आवाज़ सुनाई दी ''बाहर  आओ मृगनयनी '' वह चुपचाप बहार आ गयी उसने देखा की वो एक मोटा नाटा व्यक्ति है वैसे उसे व्यक्ति नहीं कह सकते वो तो एक भूत सा लग रहा था । परंतु मृगनयनी एक बहुत ही समझदार लड़की थी उसने इतने समय में बहुत दुनिया देख ली थी । उसने बदसूरती को नज़र अंदाज़ कर दिया , और बोली '' आप मुझको कैसे जानते है '' वो बोला मेरा नाम  शिरोधार्य '' है, में बरसों से यही रहता हूँ मुझको तो अपनी सही उम्र भी याद नहीं है , फिर थोड़ा रुक कर बोला जो भी यहाँ आता है वो किसी न किसी कार्य से ही यहाँ आता है , तुम भी यहाँ किसी उद्देश्य से ही यहाँ आयी हो । पर शायद इससे और भी कुछ बताने के लिए में उपयुक्त नहीं हूँ ।उसने उसको जूते दिए जिसमे दो - दो पंख लगे थे , फिर बोला ये मन की गति से चलते है इसलिए सावधान ! मन  में कुछ भी बुरे विचार नहीं आने चाहिये ।  

वहां से शिरोधार्य को प्रणाम करके वो आगे गंतव्य की और बढ़ चली, थोड़ा रुक कर उसने एक गहरी सांस ली । उसने अपने जूतों  की और देखा फिर उनको पहन लिया वो जूतों को अपनी बगल में दबा कर लायी थी  : p उसने अपने मन में संकल्प किया और आकाश में उड़ चली .... क्रमश:  

चलते -चलते =हर रोज बहक जाते हैं मेरे कदम, तेरे पास आने के लिये!
                     ना जाने कितने फासले तय करने अभी बाकी है तुमको पाने के लिये..!
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                                     '' मृगनयनी '' (third episode )                      अभी तक आपने पढ़ा की मृगनयनी पुजारी जी की दी हुई वस्तु को साथ लेकर आगे बढ़ती चली गयी। .... अब उससे आगे। ...... कई किलोमीटर  का फासला तय करके वह एक खुले  नीले आसमान के नीचे थी । ऊपर शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की छिटकती चांदनी और उस पर अमृत बरसाता हुआ आसमान अद्धभुत !ऐसा नज़ारा उसने अपने छोटे से जीवन में पहली बार देखा था ।           

अब उसको पहली बार ठण्ड का अहसास हुआ , और उसको इतनी ठण्ड का आभास हुआ की वह काँप गयी उसके goose bumps खड़े हो गए , उसके मन में गर्म पोशाक की चाहना प्रकट हुई.,अचानक उसके हाथ की पोटली में कुछ हलचल हुई उसने खोल के देखा तो उसके नाप के बेहद ख़ूबसूरत गर्म वस्त्र थे उसने वो वस्त्र पहन लिए और आगे बढ़ने लगी ।  

आगे जाने  पे उसे एक सफ़ेद रंग की चाँदी  की चमकती हुई झोपड़ी दिखायी दी उसने पहले तो दरवाज़े पे नॉक किया जब कोई उत्तर नहीं मिला तो वह दरवाज़ा ठेल कर अंदर आ गयी आग पे केतली में चाय बन रही थी , एक बेड  पे करीने से बिस्तर लगा था ,पास में ही एक टेबल व एक चेयर पड़ी हुई थी अंदर ऊर्जा होने के कारण काफी गर्म था , एक जगह बर्तनो को करीने से लगाया हुआ था  उसने उफनती चाय को कप में डाला और बेड  पे जाकर गहरी नींद  में सो गयी , काफी वक़्त गुजर जाने पे बहार पदचाप सुनाई देने लगे , वह कुनमुनाई। ..... 
क्रमश:
चलते- चलते =  ये ज़िन्दगी जो मुझे कर्ज़दार करती रही 
                         कभी अकेले में मिले तो हिसाब करूँ।,,,,,,,,,,,
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Sunday, November 27, 2016

                                               
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                                                        ''  मृगनयनी ''
                         ( second Episode )
अभी तक अपने पढ़ा कि निडर मृगनयनी उजाले की और बढ़ती चली गयी, अब इससे आगे। .....मृगनयनी आगे बढ़ी तो उसे लगा की वो दूसरी ही दुनिया में आ गयी है। वहां सुनहरी रोशनी एक वृक्ष में से निकल रही थी , मृगनयनी  उस वृक्ष के पास गयी तो उसका  दरवाज़ा अपने आप खुल गया और वो उसके अंदर चली गयी। उसके अंदर जाते ही उस वृक्ष का दरवाजा अपने आप बंद हो गया । 
       

अंदर घुप्प अँधेरा था , वो टटोल -टटोल कर आगे बढ़ने लगी। अचानक वो लड़खड़ाई। वो जिस पर लड़खड़ाई, वो सीढ़ी थी और जैसे ही उसका पूरा पैर उस सीढ़ी पर पड़ा तो उस वृक्ष के अंदर जो गुफा थी उसकी दोनों साइड में मशाले जल उठी। वो हिरनी सी निडरता के साथ सीढिया कूदती चली गयी- सीढियो पर हीरे , मोती, सोना, चांदी के ढेर लगे हुए थे। उनकी छठा देखने लायक थी परंतु वो उन सबको अनदेखा करके आगे बढ़ती चली गयी , शायद उसके लिए ये सब बेमोल थे ।  

थोड़ा और आगे जाने पे उसे एक मंदिर दिखाई दिया, वहां एक पुजारी जी पूजा कर रहे थे। मृगनयनी वहां गयी तो पुजारी जी उससे बोल उठे, आओ मृगनयनी मुझे तुम्हारा ही इंतज़ार था , ''बड़ी देर कर दी बेटी'' और मृगनयनी !!! आश्चर्य में भर गई !!! उन्होंने उसको एक लाल रेशमी पोटली में कुछ दिया और वह उसे लेकर एक अनजानी दिशा में आगे बढ़ती चली गयी। ..... क्रमश: 

चलते -चलते =   हुईं जो मंज़िलें तमाम, 
                      बहलाएं तुझे  कहाँ - कहाँ। ... 

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Friday, November 25, 2016


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                                                              '' मृगनयनी ''
                                                       (first Episode )     

आज की मेरी ये कहानी, एक धारावाहिक के रूप में हैं '' मृगनयनी '' ये एक बहुत ही साहसी लड़की थी । ये एक काबिले में रहती थी मृगनयनी ने जब से होश संभाल था तबसे खुद को इसने पाया की सब इसके हैं पर ''अपना'' कोई नहीं है,सब काबिले वाले इसका बहुत ख़याल रखते थे परंतु मृगनयनी को माता -पिता की कमी खलती रहती थी :( :(   

समय गुज़रता गया , मृगनयनी बारह बरस की हो चुकी थी, तब तक उसने शस्त्र , घुड़सवारी , भोजन बनाना और खेती करना भी सीख लिया था , और प्रभु भक्ति तो मानो  उसकी रग -रग में बसी थी  सही मायनो में वो एक आल राउंडर हो गयी थी , जहाँ अच्छो - अच्छो को आने में मुद्दत बीत जाती है वही ''सबकी'' मृगनयनी ने बारह बरस की उम्र में सब सीख लिया था । इसे ऊपर वाले का चमत्कार कहे या काबिले वालो का प्यार !! 

एक दिन गाँव के सभी पुरुष शहर  किसी कार्य से गए, तो पीछे से मृगनयनी को तो मानो मौका ही मिल गया इधर पुरुष शहर गए, उधर सारी महिलाये बतियाने बैठ गयी , मृगनयनी को झट से मौका मिला और पट से अपना भला उठा , घने जंगल में भाग गयी । घने  जंगल में भी  उसने अपने मनोरंजन का साधन ढूंढ रखा था ! स्वछ नीला झरना , साथ ही उसका मित्र " बाघा " जो कुछ ही महीनों का बाघ शावक था शायद अपने माता -पिता से बिछड़ कर इस जंगल में आ गया था । मृगनयनी ने ही उसे सबसे छिप - छिप कर पाला है और जब तक वो खुद अपना पेट भरना नहीं सीख जाता तब तक वो उसका ध्यान रखेगी । उसने नन्हे शावक को भाले से मछली पकड़ कर खिलाई और फिर उसे उसकी गुफा में पुआल के ऊपर लिटा दिया और खुद भी वही लेट गयी , और जल्दी ही दोनों गहरी निद्रा में चले गए । 
  
अचानक मृगनयनी को किसी तीसरे का अभास हुआ , उसने आँख खोल कर देखा तो सामने से सुनहरी किरने निकल रही थी निडर मृगनयनी ने उजाले की और अपने कदम बढ़ दिए। .... क्रमश: 

चलते चलते =ज़ुबाँ खामोश होती है , नज़र से काम होता है 
                     शायद मुहब्बत इसी का नाम होता है। .... 

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Tuesday, November 22, 2016

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                                                              ''Mudra''
मुद्रा मल्टीप्लेक्स के ग्राउंड फ्लोर पर रहती है, रोड उसके घर से बिलकुल साफ़ दिखाई देती है । सुबह का टाइम है , मनु , ऑफिस के लिए निकल गए हैं, और साथ में अपना टिफिन ले जाना नहीं भूले, वो कभी भूलते भी नहीं, उनको मुद्रा के हाथ खाना बहुत लाइक  है :) :)
    
पूरे दस साल हो गए उसको यही रूटीन फॉलो करते-करते, तभी रोड पर से एक युवती अपने साल भर के बच्चे  को लेकर निकली। मुद्रा के दिल में एक हूक सी उठ गयी। उसने मन ही मन ये तय कर लिया की आज वो मनु से बात करके रहेगी। दिन अभी बाक़ी है,काम वाली बाई घर कासारा काम निपटा कर चली गयी थी ।  पूरा दिन मुद्रा ने यू ट्यूब पर विडियो देख कर गुज़ारा , शाम के छह बज रहे थे , मनु के आने का टाइम हो रहा है ,यह देखकर मुद्रा बाथरूम में चली गयी और ठंडे पानी की छीटे अपने फेस पे मारके बैडरूम में आ गयी।  उसने मनु के पसंद लाइट ग्रीन कलरकी साड़ी पहनी,अपने लंबे बालों की ढीलीसी छोटी बना ली और उसमे एक गुलाब की कली लगा ली। लाइट पिंक कलर की लिपस्टिक लगा कर उसने अपने आप को फाइनल टच दे दिया , आज वो किसी अप्सरा से काम नहीं लग रही थी, पर उसके चहेरे पे एक उदासी साफ़ दिखाई दे रही थी ।     
रात का डिनर उसने यू ट्यूब देखते -देखते बना लिया था , पोसत के दम आलू , पाइनएप्पल  रायता ,कश्मीरी पुलाव, और स्वीट डिश में  ठंडी रबड़ी थी । अभी वो टेबल लगा कर हटी ही थी की डोरबेल बजी, उसने दरवाजा खोला  तो सामने मनु खड़े है अपनी वही चित -परिचित मुस्कान लिए हाय ''स्वीट हार्ट '' बोलकर अंदर आ गए फिर सीधा बाथ रूम में चले गए। फ्रेश हो कर नाईट सूट पहन कर आये और आते ही बोले बहुत भूख़  लगी है आज क्या बनाया है ? फिर मुद्रा की ओर देख कर बोले, आज क्या घायल करने का इरादा है तुम्हारा ? मुद्रा ने फीकी मुस्कान के साथ , पोस्ट दम आलू का कैसरोल खोला और मनु को परोस दिया । मनु को वाकई में बहुत भूख लगी थी,उन्होंने रोटी उठा कर अपनी प्लेट में रखी और बहुत मन लगा कर खाने में खोते हुए खाना  खाने लगे। 
खाना  बहुत शांति के साथ फिनिश हो गया। मुद्रा ने बस आधा -अधूरा ही कहना खाया। मुद्रा उठी और ठंडी -ठंडी रबड़ी फ्रिज से निकाल लायी ।'वाह -वाह राबड़ी भी है ',मनु  ने फ्लाइंग  किस देते हुए स्वीट डिश अपने हाथ में ले ली।  मुद्रा को मुह लटकाये बैठा देखकर , मनु खाना छोड़ कर मुद्रा से बोले क्या हुआ ?मुद्रा बिना भूमिका बंधे बोली मनु मुझे तुमसे बात करनी है । तभी मनने बिना कुछ कहे एक रिपोर्ट मुद्रा के सामने कर दी , मुद्रा ने देखा तोह उसके होश उड़ गए अब - अब वो कभी माँ nahiiii :(  
फिर अपने इमोशन पे काबू रख कर बोली कोई नहीं हम एक बच्चा अडॉप्ट कर लेंगे। बचे तो भगवन का रूप होते है ।मनु ने मुद्रा को बाहों में भर लिया ।  
चलते - चलते =
उम्र अपने हसीन ख्वाबों की मैंने तो तेरे प्यार को दे दी...
नींद जितनी थी मेरी आँखों में सब तेरे इंतज़ार को दे दी
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Friday, November 18, 2016




Special friendship  Comments

                                                                   '' नीतिभा ''
दादी माँ नितिभा को कहानी सुना रही थी, वो भी तब, जब नीतिभा दादी के बहुत पीछे पड़ी थी कि प्लीज दादी कोई कहानी सुनाओ ना ।  तब दादी  गहरी सांस लेकर नीतिभा से बोली की आज मैं तुम्हे अपने बचपन की कहानी सुनाती हूँ, जो मेरी दादी मुझे सुनाती थी । 


दादी कहानी सुना रही हैं, और नीतिभा बड़े धयान से सुन रही है । धुरुवा रात के अंधेरे में जंगल की ओर बढे जा रही थी। वह  ज्यादा बड़ी नहीं थी, उसकी उम्र यही कोई सात या आठ बरस की रही होगी । धुरुवा जैसे -जैसे जंगल की ओर बढे जा रही थी, अँधेरा और घना होता जा रहा था। लेकिन धुरुवा को कोई भी डर नहीं लग रहा था क्यूंकि  उसकी सहेली अनन्या ने उसको बताया था की  घने जंगल के अंदर जो मंदिर  है उसमे अगर रात के  घने अंधरे में जाकर मन्नत मानगो तो वे अवश्य पूरी होती है । 

और  धुरुवा की बहुत सारी  विश थी- जैसे माँ ठीक हो जाये, दादी माँ के घुटनो का दर्द ठीक हो जाये, उसका राज्य शत्रुओ से मुक्त हो जाये, उसके राज्य में सब के पास धन- सम्पदा हो, उसकी सहेली अनन्या को वो सुनहरे बालो वाली , नीली आँखों वाली बड़ी सी गुड़िया मिल जाये, आदि -आदि। 


ना जाने क्यों दादी की आंखे गीली हो गयी थी। दादी ने अपनी गीली आँखों को पोछ कर बोलने के लिए मुह खोला ही था कि नीतिभा दादी के दोनों हाथों को अपने नन्हे- नन्हे हाथों में लेकर बोली, दादी क्या हुआ ? दादी नीतिभा को लाड लडाते हुए  बोली कुछ नहीं हुआ बेटा । फिर नीतिभा से बोली, चल आगे की कहानी सुन , धुरुवा को मंदिर दिखाई देने लगा था। मंदिर देखते ही उसके पैरों में बहुत ताकत आ गयी थी ।  वो भाग कर मंदिर के अंदर गयी , वहां देखा तो एक  सुन्दर सी स्त्री बाल खोले लाल रंग की साड़ी में भगवान् की आरती कर रही थी ।  धुरुवा भी वहाँ हाथ जोड़ कर खडी हो गयी। आरती समाप्त  होने के बाद  उस सुन्दर स्त्री ने धुरुवा को प्रसाद दिया और इतनी रात को उसके आने का कारण भी पूछा ? धुरुवा  ने  अपनी सभी विश बता दी , जिसे सुनकर उस सुन्दर  स्त्री ने धुरुवा के गालों पे बड़े प्यार से हाथ फेरा और बोली की भगवान्  बच्चों की विश जरूर पूरी करते हैं । और  तभी घडी का अलार्म बहुत तेज-तेज बजने लगा , धुरुवा! धुरुवा!  माँ जोर - जोर से चिलाते हुए धुरवा के कमरे में आयी, धुरुवा ने आंखे खोल कर देखा तो वो अपने बेड पर थी। ..... 


दादी , ने अपनी कहानी ख़तम करके देखा तो नीतिभा गहरी नींद में सोई हुई थी ।  दादी भी नीतिभा की बगल में लेट कर सो गयी । 
चलते - चलते =
कोई जगा  ना देना मुझको मेरी इन जादू भरे सपनो से 
सोने दो मुझे सोने दो और खोने दो मुझे इन मीठे-मीठे सपनो में।  ....... "

Special friendship  Cards      

Sunday, May 8, 2016


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                        "मार्मिक"
 धरा, और मार्मिक बचपन के दोस्त हैं पर  ,मार्मिक ने कभी धरा को,दोस्त से अतिरिक्त कुछ नहीं माना।पर आज,मार्मिक धरा को अपलक दृष्टि से देखता रह गया,धरा ने स्काईब्लू कलर का ईवनिंग गाऊन पहन  रखा था,उस पर कंधे तक उसके खुले बाल,पिंक लिप्स सबसे बड़ी बात उसका दूधिया रंग जिसे देखकर लगता है मानो शीतलता की बरसात हो रही हो....
मार्मिक जब रात को बैड पे लेटा, तो उसकी आँखों के सामने धरा का चेहरा घूमता रहा । रात को न जाने किस वक्त उसको नींद आई होगी,सुबह में उसने सोचा । मार्मिक को अपने दोस्तों की बात याद आ गई,"जब रात को किसी लड़की का चेहरा सोने ना दे तो समझ लो कि यारों,प्यार हो गया है" ना जाने क्यों मार्मिक के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान खेल गई...
मार्मिक,अपनी फेवरेट जगह "हिल पाइन्ट" पर पहुँच गए,और अपनी दोनों बांहें फैला कर मानों बहती पुरवा हवा को अपनी बाँहों में भर लेना चाहते थे,उसमें उनको अपनी धरा का अहसास जो हो रहा था ।"हिल पाइन्ट" से वापस लौटते वक्त मार्मिक ने अपनी  बाइक धरा के घर की तरफ मोड़ ली ....

धरा, अपने घर की छत पे खडी,दूर से ही दिखाई दे रही थी । शायद,"वो" 'सन सैट' देख रही थी । मार्मिक के हाथ डोरबेल की तरफ बढे ही थे, कि,छत से नीचे झाँकते हुए, चिहुँक कर धरा की आवाज आई 'ओ मार्मिक' तुम ! अभी आती हूँ । धरा ने झट से नीचे आकर पट से डोर खोल दिया , धरा ने परपल कलर का ईवनिंग गाउन पहन रखा था, She is looking awesome...

मार्मिक का दिल किया, कि आगे बढ़ कर धरा को अपने उसी के लिए धडकते दिल से लगा लूँ....पर मार्मिक ने अपने इमोशन को काबू करते हुए,धरा के सर पे एक प्यार भरी चपत लगाते हुए बोला,बड़ी प्यारी लग रही हो । धरा के चेहरे पे एक दिल को सुकून देने वाली मुस्कान खेल गई...

धरा,मार्मिक को घर के अंदर ले आई,मार्मिक केन के बने झूले पे बैठ गया । धरा ने मार्मिक से पूछा स्ट्राबरी शेक चलेगा ? मार्मिक हँसते हुए बोला दौडेगा...

धरा फ्रेश स्ट्राबरी शेक बना लायी साथ में पोटैटो वेफर्स भी ले आई ।मार्मिक ने सिप लेते हुए कहा,अच्छा बना है ।धरा ने थैंक्स कहा ... मार्मिक ने आगे बात बढाते हुए कहा,तुमसे एक बात पुछूँ ? धरा बोली हाँ,कहो ना..मार्मिक ने कहा मुझसे शादी करोगी ? धरा ने अपनी लजाती पलकों को झुका लिया ,मार्मिक ने आगे बढ़कर धरा के हाथों को अपने हाथों में बाँध लिया...
चलते चलते _______फासले मिटा कर आपस मे प्यार  रखना ,
 प्यार का रिश्ता यु ही  बरक़रार रखना ,
बिछड़ जाये कभी आपसे हम ,
तो,आँखों मे हमेशा इंतज़ार रखना    .........

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Monday, February 1, 2016




                                                                            ''धानी''
धानी ने साड़ी के पल्ले में पिन लगाते हुए सोचा,कि आज आकाश से बात करके ये फाइनल कर लेगी,कि आखिर वो इस बार छुट्टियों में जा कहाँ रहे हैं।आकाश इतने दिनों से टालते आ रहे हैं,दोनों बच्चे,अम्बर और निलिमा नैनीताल के बोर्डिँग स्कूल में पढ़ते हैं,समर में भी एक्टीविटी क्लास के चलते बस एक या दो दिनों के लिए ही  घर आ पाते हैं।
बहुत दिनों से वो मारीशस जाने की सोच रही है,पर जाने के ऐन टाइम पर ही आकाश के फारेन डैलिगेट आने की वजह से जा नहीं पाये थे।घानी ने बालों का जूडा बना लिया,घुटनों तक लहराते उसके बालों पर आकाश आज भी जान छिडकते हैं।आज सुबह ही माली काका फ्रैश फूलों का गुलदस्ता बना कर लाये हैं,उसमें से धानी ने रैड रोज निकाल कर अपने बालों में खोंस लिया ।
तभी गँगा ने आकर पूछा, मेमसाब आज खाने में क्या बनेगा?आकाश की पसंद का खाना बनाने को कह दिया,बैंगन का भरता,अरहर की दाल और बूँदी का रायता साथ में रोटी चावल सलाद और आचार।
धानी अपने मोबाइल पर कैंडी क्रैश खेलने लगी वो कैंडी क्रैश के हजारवे लेवल पे है,समय बिताने का आधुनिक सबसे सरल और उत्तम साधन आई लव कैंडी क्रैश ये सब सोचते हुए उसके चेहरे पर एक नोटी सी मुस्कान खेल गई ।
बाहर पोर्च से गाड़ी की आवाज आई,धानी ने घड़ी देखी तीन बज चुके थे। आकाश लँच पर आ गए हैं,महाराज को खाना लगाने का बोलकर वो बाहर की तरफ लपकी,आकाश मोबाइल पर बात करते हुए सीधे स्टडी रूम की तरफ जा रहे हैं,ये देख कर धानी भी उनके पीछे चलती हुईं ,आकाश को कैच करने का एक असफल प्रयास कर रही थी ।उसको मालूम था ,कि एक बार स्टडी में जाने पर आकाश घँटे भर से पहले बाहर आने वाले नहीं हैं ।
वो फिर से कैंडी क्रैश खेलने लगी,अभी उसने एक लेवल खेला ही था की,डायनिंग टेबल से आकाश की आवाज आई धानी,हाँ कहती हुई धानी टेबल की और लपकी । साथ ही सोचती भी जा रही थी की आकाश इतनी जल्दी कैसे बाहर आ गए....
 अभी ये सोच ही रही थी की,आकाश लगभग ज़ोर से चिल्लाते हुए बोले धनि तुम्हारी मॉरीशस की फ्लाइट की टिकिट करवा दी हैं मैंने,धनि ने प्रश्नवाचक नज़रों से आकाश को देखा ,आकाश ने धनि के गालों पे हलके से चपत लगते हुए कहा की हम दोनों जा रहे हैं पगली। धनि आकाश की सीने से ज़ोर से चिपक गयी,उसके चारों और मनो वसंत छा  गया। हैप्पी एंडिग। .  ..... अरे नहीं नहीं ये क्या सोच  बैठी  हैप्पी बिगनिंग  :)
चलते चलते ____तेरे हाथ की मैं काश वो लकीर बन जाऊ,काश मैं तेरा मुकद्दर तेरी तकदीर बन जाऊ
 मैं तुझे इतना चाहू की तू भूल जाये हर रिश्ता ,सिर्फ मैं ही तेरे हर रिश्ते का जवाब बन जाऊ
तू आँखे  बंद करे तो तुझेआऊ  मैं ही नज़र ,इस तरह मैं तेरे हर ख़्वाब की ताबीर बन जाऊ  .......                      
                             
 

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