
'' मृगनयनी ''
( second Episode )
अभी तक अपने पढ़ा कि निडर मृगनयनी उजाले की और बढ़ती चली गयी, अब इससे आगे। .....मृगनयनी आगे बढ़ी तो उसे लगा की वो दूसरी ही दुनिया में आ गयी है। वहां सुनहरी रोशनी एक वृक्ष में से निकल रही थी , मृगनयनी उस वृक्ष के पास गयी तो उसका दरवाज़ा अपने आप खुल गया और वो उसके अंदर चली गयी। उसके अंदर जाते ही उस वृक्ष का दरवाजा अपने आप बंद हो गया ।
अंदर घुप्प अँधेरा था , वो टटोल -टटोल कर आगे बढ़ने लगी। अचानक वो लड़खड़ाई। वो जिस पर लड़खड़ाई, वो सीढ़ी थी और जैसे ही उसका पूरा पैर उस सीढ़ी पर पड़ा तो उस वृक्ष के अंदर जो गुफा थी उसकी दोनों साइड में मशाले जल उठी। वो हिरनी सी निडरता के साथ सीढिया कूदती चली गयी- सीढियो पर हीरे , मोती, सोना, चांदी के ढेर लगे हुए थे। उनकी छठा देखने लायक थी परंतु वो उन सबको अनदेखा करके आगे बढ़ती चली गयी , शायद उसके लिए ये सब बेमोल थे ।
थोड़ा और आगे जाने पे उसे एक मंदिर दिखाई दिया, वहां एक पुजारी जी पूजा कर रहे थे। मृगनयनी वहां गयी तो पुजारी जी उससे बोल उठे, आओ मृगनयनी मुझे तुम्हारा ही इंतज़ार था , ''बड़ी देर कर दी बेटी'' और मृगनयनी !!! आश्चर्य में भर गई !!! उन्होंने उसको एक लाल रेशमी पोटली में कुछ दिया और वह उसे लेकर एक अनजानी दिशा में आगे बढ़ती चली गयी। ..... क्रमश:
चलते -चलते = हुईं जो मंज़िलें तमाम,
बहलाएं तुझे कहाँ - कहाँ। ...

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