'' मृगनयनी '' (फिफ्थ एपिसोड )
अभी तक आपने पढ़ा मृगनयनी जूते पहन कर आकाश में उड़ जाती है। अब इससे आगे ..... वो बहुत ऊँची उड़ान उडना चाहती है , पर वो अपना मन एकाग्र नहीं कर पाती सो वह डगमगाने लगती है और नीचे आ जाती है । वह अपने जूतों को अपनी पोटली में बांध लेती है और अपने नन्हे से मन में ये सोच लेती है की शायद ये भी किसी उचित समय काम आएंगे ।
मृगनयनी दृढ़ कदमो के साथ आगे बढ़ने लगी। सुरम्य वातावरण था, मंद -मंद बयार चल रही थी, प्रकृति ने रात का आँचल ओढ़ लिया था, रजनीगंधा के पुष्पो की महक बड़ी अच्छी लग रही थी । तभी अपनी मस्ती में चलती मृगनयनी को बालक के रोने की आवाज़ सुनाई दी। वो ठिठकी और चारो ओर देखने लगी कि कहाँ से आवाज़ आ रही है। फिर जिस तरफ से आवाज़ आ रही थी, वो उसी दिशा में आगे बढ़ चली । नदी किनारे कमल के पत्ते पे एक नवजात शिशु लेटा था। उसने उसको अपने छोटे- छोटे हाथों में उठा लिया और आस -पास देखा मगर दूर - दूर तक भी कोई दिखाई नहीं दिया ।
उसने बालक को उठा लिया और आगे की ओर बढ़नेलगी। एक जगह रात का अलाव जल रहा था, उसने रात को वही रुकने का निशचय कर लिया । बालक भूखा था, उसने अपनी पोटली में देखा तो उसमे दूध की बोतल थी। अब उसकी समझ में आ गया कि उसकी छोटी- मोटी जरूरतों को तो ये पोटली ही पूरा कर देगी । बालक को दूध पीला कर उसने जमीन पर एक कपडा बिछा कर उसे सुला दिया। थकी होने के कारण उसे भी नींद आ गयी क्रमश:
चलते - चलते = उड़ान मेरी कोई मत रोको आज
उड़ने दो उड़ने दो आज मुझे गगन विशाल । .......

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