अभी तक अपने पढ़ा की मृगनयनी बेड पे लेट कर सो गयी थी, उसको बहार से पदचाप सुनाई दिए वह कुनमुनाई अब इससे आगे। ....... पास आते पदचाप को सुनकर वह उठी और बेड के नीचे छुप गयी वह पदचाप झोपडी में एंटर हो गए , मृगनैनी ने नीचे से लेटे - लेटे ही देखा की की अंदर आने वाले शख्स के पैर बहुत मोटे -मोटे हैं, उसे आने वाले शख्स की लंबाई का अंदाज़ा नहीं हुआ फिर उसने सोचा झोपडी ज्यादा बड़ी नहीं है
सो जो आया है या आयी है ज्यादा ऊँची नहीं होगी अपने इस कैलकुलेशन पे उसे बड़ी हंसी आयी ।
उसने सोचा की वो चुपके से निकल कर यहाँ से भाग जाएगी, तभी उसे एक भारी सी आवाज़ सुनाई दी ''बाहर आओ मृगनयनी '' वह चुपचाप बहार आ गयी उसने देखा की वो एक मोटा नाटा व्यक्ति है वैसे उसे व्यक्ति नहीं कह सकते वो तो एक भूत सा लग रहा था । परंतु मृगनयनी एक बहुत ही समझदार लड़की थी उसने इतने समय में बहुत दुनिया देख ली थी । उसने बदसूरती को नज़र अंदाज़ कर दिया , और बोली '' आप मुझको कैसे जानते है '' वो बोला मेरा नाम शिरोधार्य '' है, में बरसों से यही रहता हूँ मुझको तो अपनी सही उम्र भी याद नहीं है , फिर थोड़ा रुक कर बोला जो भी यहाँ आता है वो किसी न किसी कार्य से ही यहाँ आता है , तुम भी यहाँ किसी उद्देश्य से ही यहाँ आयी हो । पर शायद इससे और भी कुछ बताने के लिए में उपयुक्त नहीं हूँ ।उसने उसको जूते दिए जिसमे दो - दो पंख लगे थे , फिर बोला ये मन की गति से चलते है इसलिए सावधान ! मन में कुछ भी बुरे विचार नहीं आने चाहिये ।
वहां से शिरोधार्य को प्रणाम करके वो आगे गंतव्य की और बढ़ चली, थोड़ा रुक कर उसने एक गहरी सांस ली । उसने अपने जूतों की और देखा फिर उनको पहन लिया वो जूतों को अपनी बगल में दबा कर लायी थी : p उसने अपने मन में संकल्प किया और आकाश में उड़ चली .... क्रमश:
चलते -चलते =हर रोज बहक जाते हैं मेरे कदम, तेरे पास आने के लिये!
ना जाने कितने फासले तय करने अभी बाकी है तुमको पाने के लिये..!


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