'' मृगनयनी ''
(first Episode )
आज की मेरी ये कहानी, एक धारावाहिक के रूप में हैं '' मृगनयनी '' ये एक बहुत ही साहसी लड़की थी । ये एक काबिले में रहती थी मृगनयनी ने जब से होश संभाल था तबसे खुद को इसने पाया की सब इसके हैं पर ''अपना'' कोई नहीं है,सब काबिले वाले इसका बहुत ख़याल रखते थे परंतु मृगनयनी को माता -पिता की कमी खलती रहती थी :( :(
समय गुज़रता गया , मृगनयनी बारह बरस की हो चुकी थी, तब तक उसने शस्त्र , घुड़सवारी , भोजन बनाना और खेती करना भी सीख लिया था , और प्रभु भक्ति तो मानो उसकी रग -रग में बसी थी सही मायनो में वो एक आल राउंडर हो गयी थी , जहाँ अच्छो - अच्छो को आने में मुद्दत बीत जाती है वही ''सबकी'' मृगनयनी ने बारह बरस की उम्र में सब सीख लिया था । इसे ऊपर वाले का चमत्कार कहे या काबिले वालो का प्यार !!
एक दिन गाँव के सभी पुरुष शहर किसी कार्य से गए, तो पीछे से मृगनयनी को तो मानो मौका ही मिल गया इधर पुरुष शहर गए, उधर सारी महिलाये बतियाने बैठ गयी , मृगनयनी को झट से मौका मिला और पट से अपना भला उठा , घने जंगल में भाग गयी । घने जंगल में भी उसने अपने मनोरंजन का साधन ढूंढ रखा था ! स्वछ नीला झरना , साथ ही उसका मित्र " बाघा " जो कुछ ही महीनों का बाघ शावक था शायद अपने माता -पिता से बिछड़ कर इस जंगल में आ गया था । मृगनयनी ने ही उसे सबसे छिप - छिप कर पाला है और जब तक वो खुद अपना पेट भरना नहीं सीख जाता तब तक वो उसका ध्यान रखेगी । उसने नन्हे शावक को भाले से मछली पकड़ कर खिलाई और फिर उसे उसकी गुफा में पुआल के ऊपर लिटा दिया और खुद भी वही लेट गयी , और जल्दी ही दोनों गहरी निद्रा में चले गए ।
अचानक मृगनयनी को किसी तीसरे का अभास हुआ , उसने आँख खोल कर देखा तो सामने से सुनहरी किरने निकल रही थी निडर मृगनयनी ने उजाले की और अपने कदम बढ़ दिए। .... क्रमश:
चलते चलते =ज़ुबाँ खामोश होती है , नज़र से काम होता है
शायद मुहब्बत इसी का नाम होता है। ....


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