
'' मृगनयनी '' (सिक्स्थ एपिसोड )
अभी तक आपने पढ़ा की मृगनयनी थकी होने के कारण सो जाती है। अब इससे आगे ...... बालक के रोने से मृगनयनी की नींद खुल गयी। उसने बालक को गोद में उठाया और उसको चुप करने लगी । इतनी में वहां एक स्त्री आयी और कहने लगी मृगनयनी से, ''लाओ इसे मुझे दे दो। मेरे कोई औलाद नहीं है, में इसे पाल लूंगी।'' मृगनयनी ने उसको सवालिया दृष्टि से देखा मानो पूछ रही हो की क्यों दे दू। वह स्त्री उसकी सवालिया दृष्टि को समझ गयी और एक मीठी हंसी के साथ बोली ''मेरा नाम सुकन्या है, में आदि काल से यही रहती हूँ और सब बरसो से तुम्हारे यहाँ आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं'', और बोली कि, ''तुम जो यह बालक देख रही हो न,'' फिर क्षणिक रुक कर बोली, ''ये मायावी है''। ''मायावी?'' मृगनयनी अपनी आश्चर्यजनक आवाज़ में आँखों को चौड़ी करके बोली ! 'हाँ', वह स्त्री बोली। ''ये वही बाघ है जिसको तुम पाल रही थी, जब तुम अपने काबिले से यहाँ आ गयी तो वह बाघ तुमको बालक के रूप में मिल गया'', फिर थोड़ा रुक कर बोली कि ''तुम जब - जब मुसीबत में पड़ोगी यह बालक तुम्हारे पास किसी न किसी रूप में बचाने के लिए चला आएगा। बालक को उस स्त्री को देकर मृगनयनी ने उसको प्रणाम किया और आगे का रास्ता तय करने के लिए उससे इज़ाज़त मांगी। उस स्त्री ने मृगनयनी के सर पर आशीर्वाद भरा हाथ रखा और सजल नेत्रों से उसको विदाई दी ।
करीब तीन - चार घंटे की यात्रा करने के बाद उसको हम उम्र साथी खेलते हुए दिखाई दिए, हालाँकि वो उनको जानती नहीं थी तथापि वो उसको बहुत अपने लगे। बहुत दिनों के बाद उसको हमउम्र दिखाई दिए थे। वह भी उनके साथ पकड़म - पकड़ाई खलने लगी तभी उनमे से एक लड़का बोला ''आओ मृगनयनी मुझे पकड़ो'', मृगनयनी अब तक समझ चुकी थी की वह एक '' दिव्य काल '' में प्रवेश कर चुकी है, और जहां वह किसी बहुत बड़े उदेश्श्य को पूरा करने के लिए आयी है। मगर अब तक उसको अपना ही उद्देश्य पता नही चला है, न जाने उसको अभी और कितना चलना है और कहाँ और किसके पास जाना है? । क्रमश:
चलते - चलते = हाथ ऊपर वाले ने दिए हैं
मगर लकीरें अपनी मेह्नत से खुद बनायीं हैं। ......
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