यह एक काल्पनिक कहानी है। ......
ऊंची - ऊंची चाहरदीवारी ने उस मनमोहक खूबसूरत महल को चरों तरफ से घेर रखा था , यद्यपि वो खूबसूरत महल ही आकर्षण का केंद्र नहीं था ! तथपि वहां की खूबसूरत वारिस ''अद्वितीया '' सबके मन को मोह रही थी |
''यथा नाम तथा गुण '' वाली कहावत को चरितार्थ करती वह अद्वितीय सुंदरी, जितनी भी उसके बारें में कसीदे पढ़ लो कम ही लगते थे !!
एक बार मैं किसी काम से जा रहा था और मुझको उस महल के सामने से जाना था , तभी एक उड़ती नज़र से मैंने ''उसको '' देखा था , उसके बारें में ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी , की ''दिल में अनाहत नाद नृत्य करने लगा घंटिया सी बजने लगी '' अब तक मैंने उसके बारें में सिर्फ सुना ही था , देखा आज था और अफ़सोस इस बात का हो रहा था की में उसको अपलक दृष्टि से नयन भर देख ना सका | अब तक जो अनाहत नृत्य कर रहा था अब वहां से अचानक ठंडी आह निकल रही थी , क्योंकि मैं ''उसको '' पा नहीं सकता था | हां दोस्तों ! ये मानव जीवन की विडम्बना है , की हम उसी चीज़ को पाना चाहते है , जिसका हमको पता है की ये हमारे नसीब में नहीं है '' !!!
'' उसको '' देखने के बाद कदाचित मैं अपने लक्षय से भटक गया था , मगर कुछ देर के लिए , ज्यूँ ही मेरे पाँव में एक छोटा सा नुकीला रास्ते का पत्थर टकराया , मैं यथार्थ की भूमि पर वापस लौट आया | मैंने अपने ऑफिस का काम जल्दी से निपटाया और , '' उसकी '' छवि को मन में बसाये पथ पर निकल पड़ा | शाम का धुधंलका बढ़ता जा रहा था, '' सूरज ने करवट बदल ली थी , चाँद ने तारों की चादर ओढ़ ली थी '' और हम पथ पर थे , तभी मैंने किसी को झुरमुट में जाते देखा , मुझको क्षण भर भी नहीं लगा ये पहचानने में की यह कोई तरुणी है |
तनिक जिज्ञासा सी उत्पन्न हुई , '' कौन है " ?? यह देखने के लिए मैं वहां उस ओर , झुरमुट की तरफ बढ़ गया , ज्यू - ज्यूँ मैं बढ़ता जा रहा था , त्यू - त्यू आश्चर्य से मेरी दृष्टि फैलती जा रही थी | कारण , जब मैंने झुरमुट की तरफ रुख किया था , तब वहां गहन अन्धकार सा होता देखा था , परुनु अब पूनम के चाँद सी पीली रौशनी बड़ी भली और मन को मोह लेने वाली प्रतीत हो रही थी ! तनिक दृष्टि उठा के देखी तो , मैं मंत्रमुग्ध सा देखता रह गया , उस गहराते नीले आकाश में , पूरा चाँद खिला था |
सामने पत्थरों के बीच एक , काला सा विशालकाय दरवाज़ा था , जैसे पुराने ज़माने में हुआ करता था , वह तरुणी उसी में प्रवेश कर गयी | और मैं भी छिपते - छिपाते उस विशालकाय दरवाज़े के अंदर चला गया | वहां जीरो वाट का बल्ब जल रहा था , कदाचित ज़रा अजीब लगा क्यूंकि आज तो '' LED '' का ज़माना है | वो आगे बढ़ती जा रही थी, और मैं उसको फॉलो कर रहा था |

हम करीब पचास कदम चले होंगे की , सामने एक आलौकिक प्रतिमा रखी थी , जिसकी ऊंचाई तक़रीबन दस - बारह फ़ीट होगी , उसमे से दप - दप ऊर्जा निकल रही थी , साथ ही उस जगह बड़ी शांति का अनुभव हुआ | वो तरुणी वहां , प्रतिमा के पास न खड़ी होकर अंदर गुफानुमा मुहाने के अंदर चली गयी | मैंने दो मिनट आँखे बंद करके एक गहरी सांस ली और मुझको लगा मानो सम्पूर्ण ऊर्जा मेरी देह में समा गयी हो जैसे , हालाँकि , मैं वहां से वापस लौट सकता था , परन्तु उत्सुकता ने मुझे उस तरुणी के पीछे जाने पर मजबूर सा कर दिया | मैंने उस गुफानुमा मुहाने में जो देखा वो में देखता ही रह गया !! वहां एक एक युवती बैठी थी , जो मेरे से पहले आयी उस तरुणी की किसी बात पर हस और उसके मुँह से आश्चर्यजनक रूप से बेहद ख़ूबसूरत फूल झड़ रहे थे , और अचानक उस तरुणी से कुछ कहा परन्तु क्या कहा वो में सुनने में असमर्थ रहा क्यूंकि हमारे बीच काफी फैसला था , और मैं उसको छिप कर फॉलो कर रहा था | हाँ , तो में आपके साथ शेयर कर रहा था की जैसे ही उस तरुणी ने उस मुँह से फूल झड़ने वाली युवती से कुछ कहा , तो युवती की आँखों से मोती झड़ने लगे | जिसे उस तरुणी ने अपने बैग में भर लिए साथ ही वह बड़बड़ाती जा रही थी की इस मोती के तो करोडो मिलेंगे |
क्रमशः चलते - चलते =
जाने क्यूँ आजकल, तुम्हारी कमी अखरती जा रही है
यादों के बन्द कमरे में, ज़िन्दगी सरकती जा रही है
पनपने नहीं देता कभी, बेदर्द सी उस ख़्वाहिश को
महसूस तुम्हें जो करने की, एक कोशिश होती जा रही है
दावे करती हैं ज़िन्दगी, जो हर दिन तुझे भुलाने की ,
एक नाकाम सी कोशिश होती जा रही है
आहट से भी चौंक जाए, ,
मालूम नहीं क्यों ज़िन्दगी,
मुस्कराने से भी डरती है
मगर एक न एक दिन पाउँगा जरूर तुझको
इस खवाहिश की कोशिश होती जा रही है


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